कभी फ़ुर्सत मिले तो मेरी ख़ामोशी पढ़ लेना

कभी फ़ुर्सत मिले तो मेरी ख़ामोशी पढ़ लेना, हर वो बात मिलेगी जो मैं कह नहीं पाया। तेरी ख़ामोशी में भी एक आवाज़ सुनाई देती है, दिल को अब हर…

कभी फ़ुर्सत मिले तो मेरी ख़ामोशी पढ़ लेना,
हर वो बात मिलेगी जो मैं कह नहीं पाया।

तेरी ख़ामोशी में भी एक आवाज़ सुनाई देती है,
दिल को अब हर ख़ामोशी तेरी कहानी लगती है।

हमने तो चाँद से भी तेरी मिसाल नहीं माँगी,
तू सामने था, फिर किसी रोशनी की चाह नहीं माँगी।

वो शख़्स मिला तो लगा सफ़र मुकम्मल हो गया,
फिर उसकी जुदाई ने बताया, रास्ता कितना लंबा था।

कुछ रिश्ते बारिश जैसे होते हैं इस शहर में,
भीगाते कम हैं, मगर मिट्टी की ख़ुशबू छोड़ जाते हैं।

मैंने पूछा वक़्त से, तू इतना बदल क्यों गया,
वो मुस्कुराकर बोला—तू भी तो पहले जैसा नहीं रहा।

तेरे जाने का ग़म इतना भी आसान नहीं था,
घर वही था, मगर उसमें मेरा दिल नहीं था।

हमने जिसे अपनी दुआओं में उम्र भर माँगा,
वो मिला भी तो किसी और की क़िस्मत बनकर।

अब आईने से भी नज़रें चुराने लगे हैं हम,
उसमें चेहरा कम और गुज़रा हुआ वक़्त ज़्यादा दिखता है।

तू पास नहीं फिर भी तेरा असर बाकी है,
दिल ख़ाली है मगर उसमें तेरा घर बाकी है।

By Ajay Gautam

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Ajay Gautam

Ajay Gautam Advocate: Lawyer, Author, Columnist and Poet, Founder of OnlineNewsPortal.In and MediumPulse.com