दरवाज़ा बंद करने को दिल नहीं करता

किसी के लौटने की उम्मीद अब नहीं लेकिन, दरवाज़ा बंद करने को दिल नहीं करता। हवा का रुख बदल जाने से क्या नाराज़ होना, परिंदे जानते हैं आशियाने किस तरह…

किसी के लौटने की उम्मीद अब नहीं लेकिन,
दरवाज़ा बंद करने को दिल नहीं करता।

हवा का रुख बदल जाने से क्या नाराज़ होना,
परिंदे जानते हैं आशियाने किस तरह बदलने हैं।

हँस के टाली हैं मैंने कितनी ही सदियाँ,
पर ये गुज़रता हुआ लम्हा सँभलता नहीं।

हवा के साथ बदलना भी एक हुनर ही तो है,
दरख़्त होते तो जड़ से उखड़ गए होते।

कुछ इस तरह से अकेला हुआ हूँ भीड़ में मैं,
हर एक शख़्स मिला, पर कोई मिला ही नहीं।

वो पूछते हैं कि अब दर्द कैसा रहता है,
मैं मुस्कुरा के कहता हूँ—दर्द रहता है।

बहुत संभाल के रखा था जिसे ज़माने से,
वही ख़याल मेरे हाथ से फिसलता रहा।

हमारे हिस्से में आई थी धूप उम्र भर की,
सो एक पेड़ का साया भी घर-सा लगता था।

रात चुप थी तो कई राज़ खुल गए दिल के,
सुबह आई तो सभी ज़ख़्म छुपाने निकले।

वक़्त ने छीन लिया मुझसे मेरा सब्र मगर,
मैंने हालात को इल्ज़ाम नहीं दिया अब तक।

कुछ दरवाज़े थे जिन्हें बंद किया ही नहीं,
डर था—कहीं लौट के कोई आवाज़ न दे।

अब किसी शख़्स से शिकवा भी नहीं है कोई,
जो मिला, जितना मिला—उतना ही काफ़ी निकला।

By Ajay Gautam

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Ajay Gautam

Ajay Gautam Advocate: Lawyer, Author, Columnist and Poet, Founder of OnlineNewsPortal.In and MediumPulse.com