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रह-रह कर सोचता हूँ, बयार नई है, हर आँख में अब निगाह नई है।

रह-रह कर सोचता हूँ, बयार नई है,
हर आँख में अब निगाह नई है।

लगता है लबों की ही पुकार नई है,
सिर्फ दर्द वही है, पर आह नई है।

ठहरा है ये किनारा, सिर्फ निगाह नई है,
जब मंज़िल भी नई है, क्या राह सही है।

चलते-चलते वक़्त ने इतना सिखाया,
हर हार के पीछे एक चाह नई है।

चेहरा आईने में वही नज़र आता है,
पर उसके भीतर एक पनाह नई है।

ढूँढ़ रहा ख़ुद को मुद्दतों से अब,
लगता है अनंत की राह यही है।

By Ajay Gautam