बड़े शोर आए थे, खामोशी से निकल गए,
तिजारती थे, औकात दिखा गए।
जो आईना लेकर चले थे हमें परखने,
वक़्त आया तो ख़ुद ही नज़रें झुका गए।
लहजे में अकड़ थी, बातों में फ़रेब था,
सच की एक चोट लगी, चेहरे उतर गए।
नाम बड़ा बताते थे हर महफ़िल में अपना,
इम्तिहान आया तो क़दम ही ठहर गए।
जो रिश्तों को भी सौदों में तौलते रहे,
आख़िर बाज़ार में ही सस्ते बिक गए।
हमें मिटाने निकले थे बड़ी तैयारी से,
अपनी ही चालों में उलझकर बिखर गए।
शोर से नहीं, किरदार से पहचान बनती है,
कई तूफ़ान आए, ख़ुद ही गुज़र गए।
By Ajay Gautam
