चोरी के खिलाफ सारा ज़माना है,
मगर चोर बाज़ार की तलाश में भी वही ज़माना है।
इल्ज़ाम बेईमान पर लगाना बहुत आसान है,
आईना सामने हो तो हर शख़्स परेशान है।
हाथ में पत्थर लिए हैं सब शरीफ़ लोग,
अपने घर की खिड़कियों के काँच कौन देखेगा।
उसूलों की बातें करने वाले कम नहीं यहाँ,
बस अपने मतलब की घड़ी में उसूल बदल जाते हैं।
बाज़ार में हर चीज़ का खरीदार बैठा है,
ईमान बिके तो पूछते हैं—दाम कितना है?
चोर को पकड़ने निकले थे शहर के नेक लोग,
रास्ते में माल देखा तो ख़रीदार बन गए।
चेहरों पे शराफ़त, दिलों में सौदेबाज़ी है,
ये कैसी दुनिया है, कैसी ईमानदारी है।
दूसरों की जेब पर सबकी नज़र रहती है,
अपनी बारी आए तो मजबूरी निकलती है।
जो कल तलक चोरी को गुनाह कहते थे,
आज वही पूछते हैं—माल कहाँ सस्ता मिलता है?
दुनिया को दोष देने से पहले इतना याद रख,
इस चोर बाज़ार में खरीदार भी हम ही हैं।
By Ajay Gautam
