जिसने लिखा, जितना लिखा—झूठ लिखा,
एहसास कभी भी बयाँ हो नहीं सकते।
लफ़्ज़ों में कहाँ समा पाते हैं जज़्बात,
जो दिल में हों, वो कहे जा नहीं सकते।
काग़ज़ पे उतारने चला था दिल की बात,
हर लफ़्ज़ के बाद कुछ अधूरा रह गया।
कुछ एहसास रहे साँसों में सिमटकर,
कुछ बातें आँखों ने कही, आवाज़ न आई।
कुछ बातें सिर्फ़ महसूस हुआ करती हैं,
हर बात का कोई अल्फ़ाज़ नहीं होता।
दिल में जो उतर जाए किसी की तरह,
उस एहसास का कोई अंदाज़ नहीं होता।
दर्द लिखने बैठे तो स्याही कम पड़ गई,
याद लिखी तो आँखें नम पड़ गईं।
कैसे लिखते उस रिश्ते की पूरी कहानी,
जहाँ एक ख़ामोशी में सदियाँ गुज़र गईं।
कहना था बहुत कुछ, मगर कह न सके,
दिल में था जो, लफ़्ज़ों में ढल न सके।
वो एहसास आज भी ज़िंदा है सीने में,
जिसे चाहकर भी हम कभी लिख न सके।
लिख दूँ अगर हर एहसास को काग़ज़ पर,
तो शायद वो एहसास फिर एहसास न रहे।
कुछ जज़्बात दिल में ही अच्छे लगते हैं,
हर सच ज़रूरी नहीं कि अल्फ़ाज़ में रहे।
By Ajay Gautam
