News And Articles To Read

फ़िर आ, सता, मगर साथ निभा, यूँ मुँह फेरना भी, क़त्ल से कम नहीं।

फ़िर आ, सता, मगर साथ निभा,
यूँ मुँह फेरना भी, क़त्ल से कम नहीं।

तेरी ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती है,
ये बेरुख़ी मगर किसी ख़ंजर से कम नहीं।

तू रूठे तो मना लूँगा किसी तरह तुझे,
बस यूँ छोड़ जाना, किसी सज़ा से कम नहीं।

तू पास रहे तो हर दर्द गवारा है मुझे,
तेरा दूर होना ही, मौत से कम नहीं।

तू चाहे तो हर रोज़ मुझे आज़मा,
बेवजह तेरा बदल जाना, सितम से कम नहीं।

तेरी एक नज़र के लिए उम्र गुज़र जाएगी,
ये नज़रअंदाज़ी भी, क़हर से कम नहीं।

By Ajay Gautam