सफ़र की कामयाबी का फ़ैसला मंज़िल नहीं करती,
किसी की मौत बताती है कि ज़िंदगी कैसी गुज़री थी।
बहुत ख़ास था या आम, ये अंजाम बतलाएगा,
किसे क्या मिला जीकर, ज़माना बाद में बताएगा।
अभी क्यों कर रहे हो फ़ैसला इस शख़्स की क़ीमत का,
कहानी पूरी कहाँ हुई, अभी तो साँस बाक़ी है।
मंज़िल मिली या उम्र यूँ ही रास्तों में कट गई,
ये हिसाब आख़िरी साँस के बाद ही खुलता है।
तुम अपनी जीत पर इतरा रहे हो आज बेशक,
अभी तो वक़्त बाक़ी है, हिसाब आख़िर में होगा।
किसी की शोहरत को उसकी ज़िंदगी से मत तौलो,
कई नाम मरने के बाद सदियों तक ज़िंदा रहते हैं।
हर शख़्स अपनी कहानी का हीरो समझता है ख़ुद को,
मगर किरदार की कीमत आख़िरी पर्दे पर खुलती है।
मौत आकर नहीं लिखती फ़क़त आख़िरी तारीख़,
कभी-कभी वो आदमी की पूरी ज़िंदगी पढ़ देती है।
By Ajay Gautam
