करों की धूप में जलता रहा हर एक मकाँ,
हुकूमत कहती रही—सबके लिए है आसमाँ।
जो रोटी, हवा और पानी का सवाल पूछते हैं,
उन्हीं सवालों से अक्सर हुक्मरान रूठते हैं।
करों का बोझ बढ़ता गया हर रोज़ की थाली पर,
सियासत मुस्कुराती रही जनता की लाचारी पर।
नदियाँ भी थीं, जंगल भी थे, पहाड़ भी सलामत थे,
जब लालच कम था तो मौसम भी हमारे साथ थे।
किसानों की चीखें जब सड़कों तक आईं,
तब जाकर सत्ता ने अपनी भूलें समझ पाईं।
कभी नोट बदले, कभी कानून बदलते रहे,
हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बस संभलते रहे।
सरकारी स्कूल बंद हुए तो सवाल उठे हजार,
बच्चों की किताबों से बड़ा कैसे हो बाजार?
कभी कानून के नाम पर जनता को समझाया गया,
कभी जनता के सवालों को ही गलत बताया गया।
सियासत के फैसले जब घर तक पहुँच जाते हैं,
तब वोटर नहीं, इंसान सवाल उठाते हैं।
जिस देश की मिट्टी से किसान की पहचान है,
उसकी आवाज़ सुनना भी लोकतंत्र की शान है।
जनता खामोश हो तो इसे रज़ामंदी मत समझ,
हर चुप्पी के पीछे कोई कहानी होती है।
सत्ता बदलती रहती है, सवाल वही रहते हैं,
गरीब की थाली में क्यों ख्वाब कम रहते हैं?
करोड़ों की योजनाएँ कागज़ पर चमकती रहीं,
गाँव की टूटी सड़कें फिर भी चुपचाप रहती रहीं।
मुल्क सिर्फ़ सरकारों से नहीं चलता साहब,
जनता के सवालों से ही लोकतंत्र चलता है।
By Ajay Gautam
