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भारत की राजनीति पर हल्के-फुल्के लेकिन तीखे व्यंग्य

भारत की राजनीति पर हल्के-फुल्के लेकिन तीखे व्यंग्य

राजनीति में वादे भी मौसम जैसे होते हैं—चुनाव से पहले बरसते हैं और चुनाव के बाद गायब हो जाते हैं।
नेता जी कहते हैं कि जनता हमारी ताकत है, बस चुनाव खत्म होते ही वही ताकत उन्हें परेशान करने लगती है।
भारत में राजनीति इतनी लोकतांत्रिक है कि हर नेता जनता की सुनता है—बस अपनी बारी आने तक।
चुनाव के समय नेता घर-घर आते हैं, जीतने के बाद जनता को उनसे मिलने के लिए दफ्तर-दफ्तर जाना पड़ता है।
राजनीति में कुर्सी बड़ी अजीब चीज़ है—जिसे मिल जाए, वह छोड़ना नहीं चाहता और जिसे न मिले, वह चैन से बैठना नहीं चाहता।
हर पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ती है, फर्क सिर्फ इतना है कि लड़ाई सत्ता में आने से पहले होती है।
नेताओं की याददाश्त कमाल की होती है—जनता की हर समस्या चुनाव से पहले याद रहती है और चुनाव के बाद सब भूल जाते हैं।
घोषणापत्र पढ़कर लगता है देश बदलने वाला है, और चुनाव परिणाम आते ही पता चलता है कि सिर्फ सरकार बदली है।
राजनीति में ‘जनसेवा’ शब्द बहुत लोकप्रिय है—खासकर तब, जब सेवा का रास्ता सीधे सत्ता की कुर्सी तक जाता हो।
भारत की राजनीति में सबसे मजबूत चीज़ विचारधारा नहीं, चुनाव के समय सही गठबंधन होता है।
चुनाव आते ही नेताओं को जनता की याद ऐसे आती है, जैसे परीक्षा के समय भगवान की।
हमारे देश में वादे इतने तेज़ दौड़ते हैं कि विकास उनके पीछे हाँफता रह जाता है।
नेता जी ने कहा—“अच्छे दिन आने वाले हैं।” जनता ने पूछा—“किसके घर?”
राजनीति में कुर्सी इतनी शक्तिशाली है कि दुश्मन भी चुनाव के समय भाई बन जाता है।
चुनाव से पहले नेता जनता के चरणों में होते हैं, चुनाव के बाद जनता नेता के दरवाज़े पर।
हमारे यहाँ नेता बदलते रहते हैं, लेकिन भाषण में “गरीबी हटाओ” का मौसम हमेशा बना रहता है।
नेता जी ने सड़क बनाने का वादा किया था; पाँच साल बाद सड़क तो नहीं बनी, लेकिन वादे की याद में गड्ढे ज़रूर बन गए।
भारतीय राजनीति में मौसम से ज्यादा तेजी से विचारधाराएँ बदलती हैं।
नेता जी का सबसे बड़ा हुनर यही है कि हार को “जनता का संदेश” और जीत को “जनता का आशीर्वाद” बता देते हैं।
चुनाव में जनता राजा होती है, बाकी पाँच साल लोकतंत्र उसे पहचानने से भी इंकार कर देता है।
नेता का भाषण सुनकर लगता है कि देश स्वर्ग बनने वाला है, बिजली का बिल देखकर लगता है कि स्वर्ग जाने की तैयारी हो रही है।
राजनीति में वादे मुफ्त होते हैं, इसलिए उनकी कीमत भी कोई नहीं चुकाता।
नेता जी हर चुनाव में कहते हैं—“यह चुनाव विकास का है।” जनता सोचती है—“पिछली बार कौन-सा चुनाव था?”
भारतीय राजनीति में पार्टी बदलना इतना आसान है कि मौसम विभाग भी नेताओं से मौसम बदलना सीख सकता है।
नेता जी की याददाश्त कमाल की होती है—जनता से किया वादा भूल जाते हैं, लेकिन विपक्ष का बयान दस साल बाद भी याद रहता है।
चुनावी घोषणा-पत्र वह किताब है जिसे पढ़ने वाला कम और भूलने वाला ज्यादा होता है।
नेता जी ने कहा—“मैं जनता का सेवक हूँ।” जनता ने पूछा—“तो फिर आपकी सेवा के लिए इतनी सुरक्षा क्यों?”
राजनीति में सच बोलना भी एक चुनावी रणनीति है—बस सही समय पर बोलना जरूरी है।
नेता जी का भाषण खत्म होते ही जनता को पता चलता है कि सवाल कुछ और था और जवाब कुछ और।
चुनावी रैली में कुर्सियाँ हजारों होती हैं, लेकिन जनता की समस्याओं के लिए जगह हमेशा कम पड़ जाती है।
नेता जी कहते हैं—“देश बदल रहा है।” जनता कहती है—“हाँ, हर चुनाव में उम्मीदवार बदल रहे हैं।”
राजनीति में दोस्ती स्थायी नहीं होती, लेकिन सत्ता की दोस्ती बहुत गहरी होती है।
नेता जी का विकास इतना तेज़ है कि उद्घाटन के पत्थर पहले आ जाते हैं, काम बाद में।
हमारे यहाँ चुनाव लोकतंत्र का त्योहार है—जिसमें जनता पाँच साल में एक बार “वीआईपी” बनती है।
नेता जी जनता से कहते हैं—“आपका एक वोट देश बदल सकता है।” जनता सोचती है—“पाँच साल में एक वोट से इतना बड़ा काम कैसे होगा?”
राजनीति में हर नेता ईमानदार होने का दावा करता है, बस उसकी ईमानदारी की जाँच हमेशा दूसरे दल के नेताओं से शुरू होती है।
चुनाव के समय नेता जी को हर गली याद रहती है; जीतने के बाद गली का नाम पूछना पड़ता है।
नेता जी ने कहा—“महँगाई कम होगी।” जनता ने पूछा—“कब?” जवाब आया—“अगले चुनाव में फिर मिलेंगे।”
भारतीय राजनीति में आरोप भी विरासत में मिलते हैं और जवाब भी।
नेता जी जनता को सपने दिखाते हैं और जनता पाँच साल तक उन सपनों की किश्तें भरती रहती है।
राजनीति में कुर्सी के चार पाए होते हैं, लेकिन उसे पकड़ने के लिए दस पार्टियाँ तैयार रहती हैं।
नेता जी ने कहा—“देश के लिए त्याग करूँगा।” जनता ने पूछा—“कुर्सी?” नेता जी बोले—“इतना भी नहीं।”
चुनावी मौसम में नेताओं की मुस्कान देखकर लगता है कि देश में कोई समस्या बची ही नहीं।
जनता की समस्या जितनी पुरानी होती जाती है, चुनावी भाषण में उसका समाधान उतना ही नया बताया जाता है।
राजनीति का गणित बड़ा अजीब है—दो और दो कभी चार होते हैं, कभी सरकार।
नेता जी विपक्ष में रहते हुए हर योजना को गलत बताते हैं और सत्ता में आते ही उसी योजना को ऐतिहासिक बताते हैं।
हमारे नेता भविष्य की इतनी चिंता करते हैं कि अगले चुनाव की तैयारी आज से शुरू कर देते हैं।
चुनावी वादा वह सपना है जो नेता खुली आँखों से जनता को दिखाता है और जीतते ही खुद सो जाता है।
जनता कहती है—“हमें रोजगार चाहिए।” नेता कहते हैं—“पहले हमें समर्थन दीजिए।”
राजनीति में “जनहित” एक ऐसा शब्द है जिसे हर पार्टी अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित करती है।
नेता जी का भाषण सुनकर लगता है कि देश की सारी समस्याएँ विपक्ष ने पैदा की हैं और सारी खुशियाँ नेता जी ने।
चुनाव हारने के बाद नेता जी कहते हैं—“जनता ने हमें नकारा नहीं, हमें और मजबूत होने का अवसर दिया है।”
जीतने वाला नेता जनता की आवाज़ कहलाता है और हारने वाला ईवीएम की।
भारतीय राजनीति में कुर्सी से बड़ा कोई पद नहीं और कुर्सी बचाने से बड़ा कोई सिद्धांत नहीं।