समझ तो बढ़ रही है, पर रिश्ते सिमट रहे हैं,
लोग करीब बहुत हैं, मगर अपने कहाँ मिलते हैं।
हर बात समझने लगे हैं, एहसास खोते जा रहे हैं,
रिश्ते तो बहुत हैं, मगर रिश्ते कहाँ निभा रहे हैं।
ज़रूरतों ने रिश्तों का मतलब बदल दिया,
लोग पास तो रहते हैं, मगर साथ नहीं रहते।
चेहरों की भीड़ में पहचान ढूँढते रहे,
समझदार हुए तो हर रिश्ते को तौलने लगे।
बातों में अपनापन, निगाहों में हिसाब मिलता है,
इस दौर में हर कोई अपना कहाँ मिलता है।
रिश्ते अब दिल से नहीं, हालात से बनते हैं,
लोग अपने कम, मतलब के ज़्यादा मिलते हैं।
समझ बढ़ी तो जाना, खामोशी भी जवाब है,
हर करीब बैठा शख़्स अपना नहीं होता, यही हिसाब है।
By Ajay Gautam
