News And Articles To Read

नज़र से गिरा कर भी, इन्हें नज़रों से देखना पड़ रहा है

नज़र से गिरा कर भी, इन्हें नज़रों से देखना पड़ रहा है,
दिल से निकाल दिया, फिर भी ज़िक्र करना पड़ रहा है।
वक्त का तकाज़ा है, साथ भी निभाना पड़ रहा है,
बस दुनिया की ख़ातिर, मुस्कुराना पड़ रहा है।
अजीब दौर है साहब, अपनों में अजनबी बनकर रहना पड़ रहा है।

हर दर्द को हँसी के पर्दे में छुपाना पड़ रहा है,
अपने ही ज़ख्मों पर खुद मरहम लगाना पड़ रहा है।
जिन हाथों ने कभी सहारा दिया था उम्र भर,
आज उन्हीं से फासला भी निभाना पड़ रहा है।

शिकायतें हज़ार हैं, मगर लब ख़ामोश हैं,
हर सवाल का जवाब, ख़ामोशी से देना पड़ रहा है।
रिश्ते बचाने की ज़िद में, ख़ुद को ही खो बैठे,
हर रोज़ आईने से नज़रें चुराना पड़ रहा है।

किस्मत का लिखा समझकर सब कुछ सह रहे हैं,
टूटकर भी हर पल संभलना पड़ रहा है।
क्या कहें इस ज़िंदगी की मजबूरियों का हिसाब,
ज़िंदा तो हैं, मगर हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरना पड़ रहा है।

By Ajay Gautam