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ये ख़्वाब टूटे, मैं जागूँ, तब तो कुछ कहूँ

ये ख़्वाब टूटे, मैं जागूँ, तब तो कुछ कहूँ,
या उम्मीदों के मरने के डर को ही हक़ीक़त बना लूँ।

अभी तो आँखों में धुंध है, दिल भी ख़ामोश है,
क्यों न इस ख़ामोशी को ही मैं फ़ैसला मान लूँ।

जो होना है, वो होगा, ये सोचकर जी भी लूँ अगर,
तो क्या हर अधूरी दुआ को अपनी ही ख़ता मान लूँ।

साँस चल रही है, इसलिए ख़ामोश हूँ,
कहीं जीते-जी ख़ुद को ही बुत न बना लूँ।

तक़दीर हो या तदबीर, बस एक ही इरादा है—
कि ख़्वाब टूटें, मैं जागूँ, और उन्हें मुक़द्दस बना लूँ।

By Ajay Gautam