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यही दस्तूर है शायद इस दुनिया की रवायत का, जो सबका हमदर्द बना, उसे अपना हमदर्द न मिला।

यही दस्तूर है शायद इस दुनिया की रवायत का,
जो सबका हमदर्द बना, उसे अपना हमदर्द न मिला।

दूसरों की राहों में चिराग़ बनकर जले,
अपनी ही रात आई तो उजाला न मिला।

सबके ज़ख्मों पर मरहम लगाते रहे उम्र भर,
अपने ही दर्द का कोई सहारा न मिला।

दूसरों के आँसू पोंछते-पोंछते यूँ गुज़री ज़िंदगी,
अपने ही ग़मों का कभी हिसाब न मिला।

लोगों के अँधेरों में रोशनी बाँटते रहे,
अपने हिस्से का एक दिया भी न जला।

मशवरे देना तो बड़ी आसानी से आ गया,
अपने ही फ़ैसलों का बोझ मगर संभाला न गया।

सबको मंज़िलों का रास्ता दिखाने का हुनर था,
अफ़सोस, अपने ही सफ़र का किनारा न मिला।

हर दर्द की दवा बताते रहे दुनिया को,
अपने ज़ख्मों का मगर कोई इलाज न मिला।

By Ajay Gautam