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क्या ज़माना था कि हर बात में अपनापन था

क्या ज़माना था कि हर बात में अपनापन था,
वो जो हँसते थे तो महफ़िल में उजाला होता था।

रात भर चाँद भी हमसे ये शिकायत करता है,
तुम बदलते गए, पहले तो ये इरादा न था।

जिन गलियों में कदम रखते ही सुकून आता था,
अब वहीं दिल को ठहरने का सहारा न रहा।

वक़्त ने कैसे सभी रिश्तों को धुँधला कर दिया,
जो कभी अपना था, अब वो भी हमारा न रहा।

याद आती हैं वो बातें, वो हँसी, वो क़िस्से,
अब तो हर लफ़्ज़ में बस दर्द का साया सा रहा।

वो जो कहते थे कभी साथ न छोड़ेंगे तेरा,
आज वो नाम भी लेने से कतराता सा रहा।

हमने बहुत ख़्वाब सजाए थे कभी,
अब वही ख़्वाब आँखों में खटकता सा रहा।

इस बस्ती में कभी रौनकें बसती थीं बहुत,
अब वही शहर सुनसान नज़र आता रहा।