अभी जीवित हो तो जंगल और पहाड़ देख लो,
अगले दशक शायद ये केवल किताबों में मिलेंगे।
यह कोई कल्पना नहीं,
यह भविष्य की दस्तक है।
धरती हर दिन घायल होती है,
और इंसान अपनी ही जड़ों पर प्रहार करता है।
पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने
हरियाली का आँचल छीन लिया।
घरों, सड़कों और कारखानों की दौड़ में
जंगलों का अस्तित्व दाँव पर लगा दिया।
प्रदूषण ने हवा को ज़हर बनाया,
नदियों का निर्मल जल मैला कर दिया।
जलवायु परिवर्तन की तपती साँसों ने
पक्षियों के गीत और बादलों का साया छीन लिया।
पहाड़, जो सदियों से अडिग प्रहरी थे,
आज खदानों की चोट सह रहे हैं।
सीमेंट और पत्थरों की भूख में
उनके सीने रोज़ चीर दिए जा रहे हैं।
जंगल केवल पेड़ों का नाम नहीं,
वे धरती की धड़कन हैं।
पहाड़ केवल चट्टानों का ढेर नहीं,
वे नदियों की जननी और जीवन के प्रहरी हैं।
जब जंगल उजड़ते हैं,
तो बारिश भी रूठ जाती है।
जब पहाड़ टूटते हैं,
तो नदियों की दिशा बदल जाती है।
और जब प्रकृति हारती है,
तो अंततः इंसान ही हार जाता है।
कल की पीढ़ियाँ पूछेंगी—
“क्या सचमुच धरती पर इतने घने जंगल थे?
क्या सच में बर्फ़ से ढके पहाड़ आसमान से बातें करते थे?”
तब हमारे पास उत्तर नहीं होंगे,
सिर्फ़ तस्वीरें होंगी… और पछतावा होगा।
आओ, अभी भी समय है।
एक पौधा लगाएँ,
एक पेड़ बचाएँ,
एक पहाड़ की पुकार सुनें,
और प्रकृति को केवल संसाधन नहीं,
अपना परिवार समझें।
याद रखो—
“अभी जीवित हो तो जंगल और पहाड़ देख लो,
अगले दशक शायद ये केवल किताबों में मिलेंगे।”
क्योंकि यदि आज हमने प्रकृति को नहीं बचाया,
तो कल इतिहास हमें नहीं,
हमारी सबसे बड़ी भूल को याद रखेगा।
जहाँ कभी देवदार गाते थे,
अब मशीनों का शोर गूंजता है।
जहाँ नदियाँ हँसती थीं कल-कल,
वहाँ धूल का साम्राज्य बसता है।
पहाड़ों की छाती चीरकर
सड़कों का जाल बिछाया जाता है,
हर कटते हुए वृक्ष के संग
एक मौसम भी मर जाता है।
जंगल केवल लकड़ी नहीं,
धरती की धड़कन होते हैं।
इनकी साँसों से ही तो
हम सबके जीवन के सपने पलते हैं।
पक्षियों के उजड़े आशियाने,
सूनी होती हर एक डाल,
मौन खड़े हैं वृक्ष सभी,
सुनते अपनी अंतिम पुकार।
बादल भी अब सोचते होंगे,
किस आँगन में बरसें आकर?
जब हरियाली ही खो जाएगी,
किसे जीवन देंगे मुस्काकर?
विकास अगर विनाश बने तो
ऐसी प्रगति किस काम की?
जो भविष्य ही छीन ले बच्चों का,
वह जीत नहीं, है हार सभी की।
कल शायद बच्चे पूछेंगे—
“दादा, जंगल सच में होते थे?”
इसलिए अभी भी समय है,
धरती की पुकार सुन लो।
एक-एक पौधा अपना समझो,
हर जंगल का मान चुन लो।
अभी जीवित हो तो जंगल और पहाड़ देख लो,
अगले दशक शायद ये केवल किताबों में मिलेंगे।
अगर आज भी हम न जागे,
तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।
By Ajay Gautam
