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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट: निजी मंदिरों के प्रबंधन में सरकार का कोई अधिकार नहीं, राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर को प्रबंधक नहीं बनाया जा सकता

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट: निजी मंदिरों के प्रबंधन में सरकार का कोई अधिकार नहीं, राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर को प्रबंधक नहीं बनाया जा सकता

Madhya Pradesh High Court: Ramakant Tiwari vs The State Of Madhya Pradesh on 16 June, 2026 WRIT PETITION No. 1737 of 2011

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि निजी (Private) मंदिरों के प्रबंधन में राज्य सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता। यदि कोई मंदिर निजी है, तो उससे संबंधित भूमि के राजस्व अभिलेखों (Revenue Records) में कलेक्टर या पुजारी का नाम प्रबंधक (Manager/Trustee) के रूप में दर्ज नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में केवल देवता (Deity) का नाम ही भूमि स्वामी (Bhumiswami) के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।

यह फैसला रमाकांत तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (Writ Petition No. 1737 of 2011) में 16 जून 2026 को न्यायमूर्ति दीपक खोत की एकलपीठ ने सुनाया। याचिकाकर्ता ने राजस्व रिकॉर्ड में अपनी भूमि पर कलेक्टर का नाम प्रशासक के रूप में दर्ज किए जाने को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि संबंधित मंदिर निजी है और सरकार द्वारा कलेक्टर का नाम दर्ज करना अवैध है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने तर्क दिया कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड में मंदिर की भूमि दर्ज होने तथा सरकारी परिपत्रों के आधार पर कलेक्टर का नाम प्रबंधक के रूप में दर्ज किया गया था। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि केवल सरकारी परिपत्रों के आधार पर निजी मंदिरों के प्रबंधन में सरकार दखल नहीं दे सकती। इस संबंध में अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के State of Madhya Pradesh v. Pujari Utthan Evam Kalyan Samiti (2021) 10 SCC 222 के निर्णय का विस्तृत उल्लेख किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि देवता एक विधिक (Juristic) व्यक्ति माने जाते हैं, इसलिए मंदिर से जुड़ी संपत्ति का स्वामित्व देवता का होता है। निजी मंदिरों में सरकार द्वारा पुजारी नियुक्त करना या कलेक्टर को प्रबंधक के रूप में दर्ज करना कानूनसम्मत नहीं है। यदि मंदिर निजी है, तो उसके प्रबंधन का अधिकार उस व्यक्ति या परिवार को प्राथमिकता के साथ मिलेगा जिसने मंदिर या उससे जुड़ी संपत्ति की स्थापना की हो अथवा उसके वैध उत्तराधिकारियों को।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी भूमि के निजी होने या मंदिर से संबद्ध होने को लेकर स्वामित्व का विवाद है, तो उसका अंतिम निर्णय दीवानी न्यायालय (Civil Court) द्वारा ही किया जाएगा। रिट याचिका के माध्यम से ऐसे जटिल स्वामित्व विवादों का निस्तारण नहीं किया जा सकता।

निर्णय में हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप सभी जिलों के कलेक्टरों को आवश्यक निर्देश जारी करें। साथ ही, प्रत्येक कलेक्टर को यह जांच करने का निर्देश दिया गया कि संबंधित मंदिर सार्वजनिक (Public) है या निजी (Private)। यदि जांच में मंदिर निजी पाया जाता है और भूमि देवता के नाम दर्ज है, तो राजस्व रिकॉर्ड में केवल देवता का नाम ही दर्ज किया जाए तथा कलेक्टर या किसी अन्य व्यक्ति का नाम प्रबंधक के रूप में दर्ज न किया जाए। मंदिर की भूमि किसी भी स्थिति में हस्तांतरित न करने का भी निर्देश दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय: पुजारी मालिक नहीं, केवल प्रबंधक; निजी मंदिरों का प्रबंधन सरकार नहीं संभाल सकती

Supreme Court of India: The State Of Madhya Pradesh vs Pujari Utthan Avam Kalyan Samiti on 6 September, 2021 CIVIL APPEAL NO. 4850 OF 2021 (ARISING OUT OF SLP (CIVIL) NO. 33675 OF 2017)

मध्य प्रदेश में मंदिरों की भूमि और पुजारियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुजारी मंदिर की संपत्ति का स्वामी (Bhumiswami) नहीं होता, बल्कि वह केवल देवता की संपत्ति का प्रबंधक (Manager) होता है। इसलिए पुजारी को मंदिर की भूमि पर स्वामित्व या उसे बेचने, गिरवी रखने अथवा हस्तांतरित करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

यह विवाद मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जारी 21 मार्च 1994 और 7 जून 2008 के उन परिपत्रों से उत्पन्न हुआ था, जिनके माध्यम से राजस्व अभिलेखों से पुजारियों के नाम हटाने के निर्देश दिए गए थे। पुजारी उत्थान एवं कल्याण समिति ने इन परिपत्रों को चुनौती दी थी और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से राहत प्राप्त की थी। इसके विरुद्ध राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देवता (Deity) एक विधिक व्यक्तित्व (Juristic Person) हैं और मंदिर की संपत्ति उन्हीं की होती है। पुजारी केवल पूजा-अर्चना करने और मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन करने के लिए नियुक्त व्यक्ति है। यदि वह अपने दायित्वों का पालन नहीं करता, तो उसका प्रबंधन का अधिकार वापस लिया जा सकता है। इसलिए उसे भूमिस्वामी नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 या किसी अन्य वैधानिक प्रावधान में ऐसा कोई अनिवार्य नियम नहीं है कि राजस्व रिकॉर्ड में पुजारी या प्रबंधक का नाम दर्ज किया ही जाए। यदि कानून में कोई निषेध नहीं है, तो राज्य सरकार मंदिर की संपत्ति की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक निर्देश (Executive Instructions) जारी कर सकती है। इसलिए पुजारियों के नाम हटाने संबंधी सरकारी परिपत्र अवैध नहीं हैं।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सीमा भी निर्धारित की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कलेक्टर को प्रत्येक मंदिर का प्रबंधक नहीं माना जा सकता। यदि कोई मंदिर निजी (Private Temple) है और राज्य के नियंत्रण में नहीं है, तो केवल इस आधार पर कि भूमि देवता के नाम दर्ज है, कलेक्टर का नाम प्रबंधक के रूप में राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया जा सकता। कलेक्टर तभी प्रबंधन करेगा जब मंदिर विधि के अनुसार राज्य के नियंत्रण में हो।

सुप्रीम कोर्ट ने अंततः मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के निर्णय को निरस्त करते हुए राज्य सरकार की अपील स्वीकार कर ली। न्यायालय ने कहा कि पुजारी केवल प्रबंधकीय अधिकार रखता है, स्वामित्व अधिकार नहीं। साथ ही, सरकार मंदिर की संपत्तियों की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक निर्देश जारी कर सकती है, लेकिन निजी मंदिरों के प्रबंधन पर स्वतः अधिकार स्थापित नहीं कर सकती।

इस निर्णय के प्रमुख सिद्धांत

  • देवता मंदिर की संपत्ति के विधिक स्वामी (Juristic Person) हैं।
  • पुजारी केवल प्रबंधक है, भूमिस्वामी नहीं।
  • पुजारी को मंदिर की भूमि बेचने, गिरवी रखने या हस्तांतरित करने का अधिकार नहीं है।
  • राज्य सरकार मंदिर की संपत्ति की सुरक्षा हेतु प्रशासनिक निर्देश जारी कर सकती है।
  • राजस्व रिकॉर्ड में पुजारी का नाम दर्ज करना कानूनन अनिवार्य नहीं है।
  • कलेक्टर को सभी मंदिरों का प्रबंधक नहीं माना जा सकता; निजी मंदिरों के प्रबंधन में राज्य का स्वतः कोई अधिकार नहीं है।

Supreme Court of India: The State Of Madhya Pradesh vs Pujari Utthan Avam Kalyan Samiti on 6 September, 2021 CIVIL APPEAL NO. 4850 OF 2021 (ARISING OUT OF SLP (CIVIL) NO. 33675 OF 2017)

The State Of Madhya Pradesh vs Pujari Utthan Avam Kalyan Samiti on 6 September, 2021 CIVIL AP

Madhya Pradesh High Court: Ramakant Tiwari vs The State Of Madhya Pradesh on 16 June, 2026 WRIT PETITION No. 1737 of 2011

Ramakant Tiwari vs The State Of Madhya Pradesh on 16 June, 2026 WRIT PETITION No. 1737 of 2011