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लश्कर भी, ललकार भी, पर जंग अधूरी रह गई

लश्कर भी, ललकार भी, पर जंग अधूरी रह गई,
हक़ की सदा थी होठों पर, आवाज़ दूरी रह गई।

तख़्त हिलाने निकले थे, काग़ज़ की तलवार लिए,
दफ़्तर-दफ़्तर घूमते-घूमते मजबूरी रह गई।

हमने लिखी थी अर्ज़ियाँ लहू से हर दस्तावेज़ पर,
उनके हिस्से में मगर बस खानापूरी रह गई।

रात गवाह थी हर सितम की, दिन बना नादान सा,
शोर बहुत था शहर में, सच की हाज़िरी रह गई।

जब भी उठी सच की लौ, आंधियाँ भेज दी गईं,
राख हाथों में रही, आग पुरानी रह गई।

तारीख़ों की भीड़ में उलझा रहा इंसाफ़ मेरा,
उम्र भर लड़ते रहे, पर जिंदगानी रह गई।

फैसलों के दरमियाँ इंसान पिसता ही रहा,
फाइलों की धूल में हर एक कहानी रह गई।

अब अदालत से नहीं, खुद से सवाल करता हूँ,
क्या लड़ाई सिर्फ़ मेरी थी, या बेईमानी रह गई।

Contributed By: Ajay Gautam Advocate: Lawyer / Author / Columnist