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दरिया, फ़िज़ा, अश्क और रिश्ते

दरिया, फ़िज़ा, अश्क और रिश्ते,
वो बहकर ही आए थे, जो किसी के न हुए।

जिन्हें थामने की ज़िद की,
वही रेत-से फिसल गए।

कुछ लोग बस किस्से हुए,
सबके हुए… और किसी के न हुए।

By Ajay Gautam