कभी तो कोई मुकरा होगा, अपनी ही जुबान से,
वरना लोग यूँ ही बेवजह, दस्तख़त नहीं करवाते।
जो अपने वादों की कीमत समझते हैं जनाब,
वो काग़ज़ों पर नहीं, दिलों में दस्तख़त करते हैं।
किसी के लहजे में जब डर उतर आता है,
तभी इंसान अपनी ही बात से मुकर जाता है।
बातों में भरोसा हो तो काग़ज़ किसलिए,
शायद कोई अपनी ही ज़ुबाँ हारा होगा।
मुकरने वालों की भी अजीब दास्तान है,
पहले वादा करते हैं, फिर सबूत माँगते हैं।
ज़ुबाँ का भरोसा जहाँ ख़त्म हो जाता है,
वहीं से काग़ज़ों का सिलसिला शुरू होता है।
रिश्तों में भी मुहर लगाने की नौबत आती है,
जब कोई अपनी कही बात से पलट जाता है।
By Ajay Gautam
